05 दिसंबर 2023

सेंधा नमक के बारे में जानकारी


 सेंधा नमक भारत से कैसे गायब कर दिया गया, शरीर के लिए Best Alkalizer है....


आप सोच रहे होंगे की ये सेंधा नमक बनता कैसे है ?? आइये आज हम आपको बताते हैं कि नमक मुख्य कितने प्रकार होते हैं। एक होता है समुद्री नमक दूसरा होता है सेंधा नमक (rock salt) । सेंधा नमक बनता नहीं है पहले से ही बना बनाया है। पूरे उत्तर भारतीय उपमहाद्वीप में खनिज पत्थर के नमक को ‘सेंधा नमक’ या ‘सैन्धव नमक’, लाहोरी नमक आदि आदि नाम से जाना जाता है । जिसका मतलब है ‘सिंध या सिन्धु के इलाक़े से आया हुआ’। वहाँ नमक के बड़े बड़े पहाड़ है सुरंगे है । वहाँ से ये नमक आता है। मोटे मोटे टुकड़ो मे होता है आजकल पीसा हुआ भी आने लगा है यह ह्रदय के लिये उत्तम, दीपन और पाचन मे मदद रूप, त्रिदोष शामक, शीतवीर्य अर्थात ठंडी तासीर वाला, पचने मे हल्का है । इससे पाचक रस बढ़्ते हैं। तों अंत आप ये समुद्री नमक के चक्कर से बाहर निकले। काला नमक ,सेंधा नमक प्रयोग करे, क्यूंकि ये प्रकर्ति का बनाया है ईश्वर का बनाया हुआ है। और सदैव याद रखे इंसान जरूर शैतान हो सकता है लेकिन भगवान कभी शैतान नहीं होता।



भारत मे 1930 से पहले कोई भी समुद्री नमक नहीं खाता था विदेशी कंपनीया भारत मे नमक के व्यापार मे आज़ादी के पहले से उतरी हुई है , उनके कहने पर ही भारत के अँग्रे जी प्रशासन द्वारा भारत की भोली भली जनता को आयोडिन मिलाकर समुद्री नमक खिलाया जा रहा है, हुआ ये कि जब ग्लोबलाईसेशन के बाद बहुत सी विदेशी कंपनियो (अनपूर्णा,कैपटन कुक ) ने नमक बेचना शुरू किया तब ये सारा खेल शुरू हुआ ! अब समझिए खेल क्या था ?? खेल ये था कि विदेशी कंपनियो को नमक बेचना है और बहुत मोटा लाभ कमाना है और लूT मचानी है तो पूरे भारत मे एक नई बात फैलाई गई कि आओडीन युक्त नामक खाओ , आओडीन युक्त नमक खाओ ! आप सबको आओडीन की कमी हो गई है। ये सेहत के लिए बहुत अच्छा है आदि आदि बातें पूरे देश मे प्रायोजित ढंग से फैलाई गई । और जो नमक किसी जमाने मे 2 से 3 रूपये किलो मे बिकता था । उसकी जगह आओडीन नमक के नाम पर सीधा भाव पहुँच गया 8 रूपये प्रति किलो और आज तो 20 रूपये को भी पार कर गया है।



दुनिया के 56 देशों ने अतिरिक्त आओडीन युक्त नमक 40 साल पहले ban कर दिया अमेरिका मे नहीं है जर्मनी मे नहीं है फ्रांस मे नहीं ,डेन्मार्क मे नहीं , डेन्मार्क की सरकार ने 1956 मे आओडीन युक्त नमक बैन कर दिया क्यों ?? उनकी सरकार ने कहा हमने मे आओडीन युक्त नमक खिलाया !(1940 से 1956 तक ) अधिकांश लोग नपुंसक हो गए ! जनसंख्या इतनी कम हो गई कि देश के खत्म होने का खतरा हो गया ! उनके वैज्ञानिको ने कहा कि आओडीन युक्त नमक बंद करवाओ तो उन्होने बैन लगाया। और शुरू के दिनो मे जब हमारे देश मे ये आओडीन का खेल शुरू हुआ इस देश के बेशर्म नेताओ ने कानून बना दिया कि बिना आओडीन युक्त नमक भारत मे बिक नहीं सकता । वो कुछ समय पूर्व किसी ने कोर्ट मे मुकदमा दाखिल किया और ये बैन हटाया गया आज से कुछ वर्ष पहले कोई भी समुद्री नमक नहीं खाता था सब सेंधा नमक ही खाते थे ।


🔹सेंधा नमक के फ़ायदे🔹


सेंधा नमक के उपयोग से रक्तचाप और बहुत ही गंभीर बीमारियों पर नियन्त्रण रहता है । क्योंकि ये अम्लीय नहीं ये क्षारीय है (alkaline) क्षारीय चीज जब अमल मे मिलती है तो वो न्यूटल हो जाता है और रक्त अमलता खत्म होते ही शरीर के 48 रोग ठीक हो जाते हैं ।



ये नमक शरीर मे पूरी तरह से घुलनशील है । और सेंधा नमक की शुद्धता के कारण आप एक और बात से पहचान सकते हैं कि उपवास ,व्रत मे सब सेंधा नमक ही खाते है। तो आप सोचिए जो समुंदरी नमक आपके उपवास को अपवित्र कर सकता है वो आपके शरीर के लिए कैसे लाभकारी हो सकता है ??


सेंधा नमक शरीर मे 97 पोषक तत्वो की कमी को पूरा करता है ! इन पोषक तत्वो की कमी ना पूरी होने के कारण ही Lकवे (paralysis)  का अटैक आने का सबसे बढ़ा जोखिम होता है सेंधा नमक के बारे में आयुर्वेद में बोला गया है कि यह आपको इसलिये खाना चाहिए क्योंकि सेंधा नमक वात, पित्त और कफ को दूर करता है।


यह पाचन में सहायक होता है और साथ ही इसमें पोटैशियम और मैग्नीशियम पाया जाता है जो हृदय के लिए लाभकारी होता है। यही नहीं आयुर्वेदिक औषधियों में जैसे लवण भाष्कर, पाचन चूर्ण आदि में भी प्रयोग किया जाता है।


🔹समुद्री नमक के भयंकर नुकसान :-


ये जो समुद्री नमक है आयुर्वेद के अनुसार ये तो अपने आप मे ही बहुत खतरनाक है ! क्योंकि कंपनियाँ इसमे अतिरिक्त आओडीन डाल रही है। अब आओडीन भी दो तरह का होता है एक तो भगवान का बनाया हुआ जो पहले से नमक मे होता है । दूसरा होता है “industrial iodine”  ये बहुत ही खतरनाक है। तो समुद्री नमक जो पहले से ही खत रनाक है उसमे कंपनिया अतिरिक्त industrial iodine डाल को पूरे देश को बेच रही है। जिससे बहुत सी गंभीर बीमरिया हम लोगो को आ रही है । ये नमक मानव द्वारा फ़ैक्टरियों मे निर्मित है। आम तौर से उपयोग मे लाये जाने वाले समुद्री नमक से उच्च रक्तचाप (high BP ) ,डाइबिटीज़, आदि गंभीर बीमारियो का भी कारण बनता है । इसका एक कारण ये है कि ये नमक अम्लीय (acidic) होता है । जिससे रक्त अम्लता बढ़ती है और रक्त अमलता बढ्ने से ये सब 48 रोग आते है । ये नमक पानी कभी पूरी तरह नहीं घुलता हीरे (diamond ) की तरह चमकता रहता है इसी प्रकार शरीर के अंदर जाकर भी नहीं घुलता और अंत इसी प्रकार किडनी से भी नहीं निकल पाता और पथरी का भी कारण बनता है । ये नमक Nपुंसकता और Lकवा (paralysis ) का बहुत बड़ा कारण है समुद्री नमक से सिर्फ शरीर को 4 पोषक तत्व मिलते है ! और बीमारिया जरूर साथ मे मिल जाती है रिफाइण्ड नमक में 98% सोडियम क्लोराइड ही है शरीर इसे विजातीय पदार्थ के रुप में रखता है। यह शरीर में घुलता नही है। इस नमक में आयोडीन को बनाये रखने के लिए Tricalcium Phosphate, Magnesium Carbonate, Sodium Alumino Silicate जैसे रसायन मिलाये जाते हैं जो सीमेंट बनाने में भी इस्तेमाल होते है। विज्ञान के अनुसार यह रसायन शरीर में रक्त वाहिनियों को कड़ा बनाते हैं, जिससे ब्लाक्स बनने की संभावना और आक्सीजन जाने मे परेशानी होती है। जोड़ो का दर्द और गढिया, प्रोस्टेट आदि होती है। आयोडीन नमक से पानी की जरुरत ज्यादा होती है। 1 ग्राम नमक अपने से 23 गुना अधिक पानी खींचता है। यह पानी कोशिकाओ के पानी को कम करता है। इसी कारण हमें प्यास ज्यादा लगती है। निवेदन :पांच हजार साल पुरानी आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में भी भोजन में सेंधा नमक के ही इस्तेमाल की सलाह दी गई है। भोजन में नमक व मसाले का प्रयोग भारत, नेपाल, चीन, बंगलादेश और पाकिस्तान में अधिक होता है। आजकल बाजार में ज्यादातर समुद्री जल से तैयार नमक ही मिलता है। जबकि 1960 के दशक में देश में लाहौरी नमक मिलता था। यहां तक कि राशन की दुकानों पर भी इसी नमक का वितरण किया जाता था। स्वाद के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी होता था। समुद्री नमक के बजाय सेंधा नमक का प्रयोग होना चाहिए। आप इस अतिरिक्त आओडीन युक्त समुद्री नमक खाना छोड़िए और उसकी जगह सेंधा नमक खाइये !! सिर्फ आयोडीन के चक्कर में समुद्री नमक खाना समझदारी नहीं है, क्योंकि जैसा हमने ऊपर बताया आओडीन हर नमक मे होता है सेंधा नमक मे भी आओडीन होता है बस फर्क इतना है इस सेंधा नमक मे प्राकृतिक के द्वारा भगवान द्वारा बनाया आओडीन होता है इसके इलावा आओडीन हमें आलू, अरवी के साथ-साथ हरी सब्जियों से भी मिल जाता है।आयोडीन लद्दाख को छोड़ कर भारत के सभी स्थानों के जल में प्राकृतिक रूप से पाया जाता है।



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11 मार्च 2023

rameshwar jyotirling

 रामेश्वरम धाम , तमिलनाडु 



भगवान श्री राम जी ने शिवलिंग की स्थापना की थी !!

रामेश्वरम धाम की सभी सनातन धर्म वाले जानते है। भगवान की चार धाम में से एक धाम रामेश्वर धाम भी है।  रामेश्वर धाम की  महिमा ओर शक्ति असँख्य मात्रा में है। तमिलनाडु प्रदेश भारत की दक्षिण में स्थित रामेश्वरम धाम के पास स्थित है।रामेश्वर धाम मुक्ति हेतु  सर्वश्रेष्ठ स्थान बताया गया है ।


 💐रामेश्वरम धाम तमिलनाडु प्रांत के रामनाथपुरम जिला में स्थित  है । वहाँ महादेव शिवलिंग के 12 ज्योतिर्लिंगं में से एक बताया गया है ।

कहा जाता है, जब श्रीराम रावण से युद्ध करने हेतु जा रहे थे,तभी श्रीरामजी को अनुभव हुआ कि भगवान शिव जी को प्रसन्न किये बिना  रावण से युद्ध जीतना बहुत कठिन हो जाएगा,क्योकि रावण परम् शिव भक्त था । यही सोच कर श्री राम जी ने समुद्र की किनारे  में शिवलिंग की स्थापना करके शिव जी की आराधना किये, वही रामेश्वरम धाम है।



 संस्मरण ओर अन्य स्त्रोत आधारित विस्तृत जानकारी:-

मंदिर के अंदर मीठे जल के 24कुंए हैं। इन जल कुंडों का निर्माण भगवान राम ने अपने बाण से किया ।आज 2 जल कुंड तो सुख गये हैं किन्तु बाकी 22 अभी भी सुरक्षित हैं। इनके जल से व्यक्ति के जन्मों-जन्मों के पाप खत्म हो जाते हैं।


 यह भी कहा जाता है कि जब युद्ध खत्म हुआ तो भगवान राम ने इस स्थान पर शिव पूजा करने का मन बनाया।तो हनुमान जी को शिवलिंग लाने का काम सौपा गया था. हनुमान जी शिवलिंग लेने कैलाश पर्वत गये थे और यहाँ पूजा का मुहूर्त का समय निकला जा रहा था। तो माता सीता ने रेत का शिवलिंग बनाकर, राम जी की पूजा समय पर करवाई थी। इस बात से हनुमान को दुःख हुआ क्योकि वह काफी दूर से शिवलिंग लेकर आये थे। तब राम ने हनुमान की भावनाओं को समझते हुए, आदेश दिया था कि आप रेत के शिवलिंग को खत्मकर अपना शिवलिंग यहाँ लगा दें। किन्तु बोला जाता है कि हनुमान जी रेत के शिवलिंग को यहाँ से हटा नहीं पाए थे।तभी हनुमान अपनी गलती समझ गये थे। 

 शिवपुराण में भी रामेश्वरम धाम की महिमा का गुणगान किया गया है। रामेश्वरम धाम की कलाकारी को देखने दूर-दूर से लोग आते हैं।भारत के लोगों की तुलना में विदेशी लोगों की संख्या कई बार ज्यादा ही होती है।



 यदि कोई व्यक्ति रामेश्वरम धाम में जाकर शिव का अभिषेक करता है तो उसके साथ-साथ उसकी सात अन्य पीढ़ियों का भी भगवान पार करते हैं। यहाँ जाने से जिव को आवागमन से भी मुक्ति मिलती है।


 💐रामेश्वरम मंदिर के पास ही कई अन्य हिन्दू तीर्थ स्थल हैं, जैसे हनुमानकुंड, अमृतवाटिका और बरामतीर्थ आदि, भक्तों का यहाँ जाना भी जरुरी बताया गया है।


मंदिर के पास ही एक जगह ऐसी है जिसके बारें में बताया जाता है यहाँ राम और विभीषण की पहली भेंट हुई थी. आज इस स्थान पर मंदिर बना हुआ है।


💐रामेश्वरम हिंदुओं का एक पवित्र तीर्थ है। यह तमिलनाडु के रामनाथपुरम जिले में स्थित है। यह तीर्थ हिन्दुओं के चार धामों में से एक है। इसके अलावा यहां स्थापित शिवलिंग बारह द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है।

भारत के उत्तर मे काशी की जो मान्यता है, वही दक्षिण में रामेश्वरम् की है। रामेश्वरम चेन्नई से लगभग सवा चार सौ मील दक्षिण-पूर्व में है। यह हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी से चारों ओर से घिरा हुआ एक सुंदर शंख आकार द्वीप है। बहुत पहले यह द्वीप भारत की मुख्य भूमि के साथ जुड़ा हुआ था, परन्तु बाद में सागर की लहरों ने इस मिलाने वाली कड़ी को काट डाला, जिससे वह चारों ओर पानी से घिरकर टापू बन गया। यहां भगवान राम ने लंका पर चढ़ाई करने से पूर्व पत्थरों के सेतु का निर्माण करवाया था, जिसपर चढ़कर वानर सेना लंका पहुंची व वहां विजय पाई। बाद में राम ने विभीषण के अनुरोध पर धनुषकोटि नामक स्थान पर यह सेतु तोड़ दिया था। आज भी इस 40 कि.मी० लंबे आदि-सेतु के अवशेष सागर में दिखाई देते हैं।💐

यहां के मंदिर के तीसरे प्रकार का गलियारा विश्व का सबसे लंबा गलियारा है।

रामेश्वरम् और सेतु बहुत प्राचीन है। परंतु रामनाथ का मंदिर उतना पुराना नहीं है। दक्षिण के कुछ और मंदिर डेढ़-दो हजार साल पहले के बने है, जबकि रामनाथ के मंदिर को बने अभी कुल आठ सौ वर्ष से भी कम हुए है। इस मंदिर के बहुत से भाग पचास-साठ साल पहले के है।


रामेश्वरम का गलियारा विश्व का सबसे लंबा गलियारा है। यह उत्तर-दक्षिणमें 197 मी. एवं पूर्व-पश्चिम 133 मी. है। इसके परकोटे की चौड़ाई 6मी. तथा ऊंचाई 9 मी. है। मंदिर के प्रवेशद्वार का गोपुरम 38.4 मी. ऊंचा है। यह मंदिर लगभग 6 हेक्टेयर में बना हुआ है।


💐मंदिर में विशालाक्षी जी के गर्भ-गृह के निकट ही नौ ज्योतिर्लिंग हैं, जो लंकापति विभीषण द्वारा स्थापित बताए जाते हैं। रामनाथ के मंदिर में जो ताम्रपट है, उनसे पता चलता है कि 1173 ईस्वी में श्रीलंका के राजा पराक्रम बाहु ने मूल लिंग वाले गर्भगृह का निर्माण करवाया था। उस मंदिर में अकेले शिवलिंग की स्थापना की गई थी। देवी की मूर्ति नहीं रखी गई थी, इस कारण वह नि:संगेश्वर का मंदिर कहलाया। यही मूल मंदिर आगे चलकर वर्तमान दशा को पहुंचा है।


बाद में पंद्रहवीं शताब्दी में राजा उडैयान सेतुपति और निकटस्थ नागूर निवासी वैश्य ने 1450 में इसका 78 फीट ऊंचा गोपुरम निर्माण करवाया था। बाद में मदुरई के एक देवी-भक्त ने इसका जीर्णोद्धार करवाया था। सोलहवीं शताब्दी में दक्षिणी भाग के द्वितीय परकोटे की दीवार का निर्माण तिरुमलय सेतुपति ने करवाया था। इनकी व इनके पुत्र की मूर्ति द्वार पर भी विराजमान है। इसी शताब्दी में मदुरई के राजा विश्वनाथ नायक के एक अधीनस्थ राजा उडैयन सेतुपति कट्टत्तेश्वर ने नंदी मण्डप आदि निर्माण करवाए। नंदी मण्डप 22 फीट लंबा, 12 फीट चौड़ा व 17 फीट ऊंचा है। रामनाथ के मंदिर के साथ सेतुमाधव का मंदिर आज से पांच सौ वर्ष पहले रामनाथपुरम् के राजा उडैयान सेतुपति और एक धनी वैश्य ने मिलकर बनवाया था।


सत्रहवीं शताब्दी में दलवाय सेतुपति ने पूर्वी गोपुरम आरंभ किया। 18 वीं शताब्दी में रविविजय सेतुपति ने देवी-देवताओं के शयन-गृह व एक मंडप बनवाया। बाद में मुत्तु रामलिंग सेतुपति ने बाहरी परकोटे का निर्माण करवाया। 1897– 1904 के बीच मध्य देवकोट्टई से एक परिवार ने 126 फीट ऊंचा नौ द्वार सहित पूर्वीगोपुरम निर्माण करवाया। इसी परिवार ने 1907-1925 में गर्भ-गृह की मरम्मत करवाई। बाद में इन्होंने 1947 में महाकुम्भाभिषेक भी करवाया।


💐रामेश्वरम् का मंदिर भारतीय निर्माण-कला और शिल्पकला का एक सुंदर उदाहरण  है। इसके प्रवेश-द्वार चालीस फीट ऊंचा है। प्राकार में और मंदिर के अंदर सैकड़ौ विशाल खंभें है, जो देखने में एक-जैसे लगते है ; परंतु पास जाकर जरा बारीकी से देखा जाय तो मालूम होगा कि हर खंभे पर बेल-बूटे की अलग-अलग कारीगरी है।


रामनाथ की मूर्ति के चारों और परिक्रमा करने के लिए तीन प्राकार बने हुए है। इनमें तीसरा प्राकार सौ साल पहले पूरा हुआ। इस प्राकार की लंबाई चार सौ फुट से अधिक है। दोनों और पांच फुट ऊंचा और करीब आठ फुट चौड़ा चबूतरा बना हुआ है। चबूतरों के एक ओर पत्थर के बड़े-बड़े खंभो की लम्बी कतारे खड़ी है। प्राकार के एक सिरे पर खडे होकर देखने पर ऐसा लगता है मारो सैकड़ों तोरण-द्वार का स्वागत करने के लिए बनाए गये है। इन खंभों की अद्भुत कारीगरी देखकर विदेशी भी दंग रह जाते है। यहां का गलियारा विश्व का सबसे लंबा गलियारा है।


रामनाथ के मंदिर के चारों और दूर तक कोई पहाड़ नहीं है, जहां से पत्थर आसानी से लाये जा सकें। गंधमादन पर्वत तो नाममात्र का है। यह वास्तव में एक टीला है और उसमें से एक विशाल मंदिर के लिए जरूरी पत्थर नहीं निकल सकते। रामेश्वरम् के मंदिर में जो कई लाख टन के पत्थर लगे है, वे सब बहुत दूर-दूर से नावों में लादकर लाये गये है। रामनाथ जी के मंदिर के भीतरी भाग में एक तरह का चिकना काला पत्थर लगा है। कहते है, ये सब पत्थर लंका से लाये गये थे।


रामेश्वरम् के विशाल मंदिर को बनवाने और उसकी रक्षा करने में रामनाथपुरम् नामक छोटी रियासत के राजाओं का बड़ा हाथ रहा। अब तो यह रियासत तमिल नाडु राज्य में मिल गई हैं। रामनाथपुरम् के राजभवन में एक पुराना काला पत्थर रखा हुआ है। कहा जाता है, यह पत्थर राम ने केवटराज को राजतिलक के समय उसके चिह्न के रूप में दिया था। रामेश्वरम् की यात्रा करने वाले लोग इस काले पत्थर को देखने के लिए रामनाथपुरम् जाते है। रामनाथपुरम् रामेश्वरम् से लगभग तैंतीस मील दूर है।


💐रामेश्वरम् के विख्यात मंदिर की स्थापना के बारें में यह रोचक कथाऐ कही जाती है। सीताजी को छुड़ाने के लिए राम ने लंका पर चढ़ाई की थी। उन्होने युद्ध के बिना सीताजी को छुड़वाने का बहुत प्रयत्न किया, पर जब रावण के न मानने पर विवश होकर उन्होने युद्ध किया। इस युद्ध हेतु राम को वानर सेना सहित सागर पार करना था, जो अत्यधिक कठिन कार्य था। तब श्री राम ने, युद्ध कार्य में सफलता ओर विजय के पश्र्चात कृतज्ञता हेतु उनके आराध्य भगवान शिव की आराधना के लिए समुद्र किनारे की रेत से शिवलिंग का अपने हाथों से निर्माण किया, तभी भगवान शिव सव्यम् ज्योति स्वरुप प्रकट हुए ओर उन्होंने इस लिंग को श्री रामेश्वरम की उपमा दी। इस युद्ध में रावण के साथ, उसका पुरा राक्षस वंश समाप्त हो गया और अन्ततः सीताजी को मुक्त कराकर श्रीराम वापस लौटे। 


रावण भी साधारण राक्षस नहीं था। वह महर्षि पुलस्त्य का वंशज ओर वेदों का ज्ञानी ओर शिवजी का बड़ा भक्त भी । श्रीराम को उसे मारने के बाद बड़ा खेद हुआ। ब्रह्मा-हत्या के पाप प्रायश्चित के लिए श्री राम ने युुद्ध विजय पश्र्चात भी यहां रामेश्वरम् जाकर पुुुजन किया।


💐शिवलिंग की स्थापना करने के पश्र्चात, इस लिंंग को काशी विश्वनाथ के समान मान्यता देनेे हेतु, उन्होंनेे हनुमानजी को काशी से एक शिवलिंग लाने कहा।हनुमान पवन-सुत थे। बड़े वेग से आकाश मार्ग से चल पड़े। ओर शिवलिंग लेे आए। यह देखकर राम बहुत प्रसन्न हुए और रामेश्वर ज्योतिलििंंग के साथ काशी के लिंंग कि भी स्थापना कर दी। छोटे आकार का यही शिवलिंग रामनाथ स्वामी भी कहलाता है। ये दोनों शिवलिंग इस तीर्थ के मुख्य मंदिर में आज भी पूजित हैं। यही मुख्य शिवलिंग ज्योतिर्लिंग है।


💐सेतु का पौराणिक संदर्भ


पूरे भारत, दक्षिण पूर्व एशिया और पूर्व एशिया के कई देशों में हर साल दशहरे पर और राम के जीवन पर आधारित सभी तरह के नृत्य-नाटकों में सेतु बंधन का वर्णन किया जाता है। राम के बनाए इस पुल का वर्णन रामायण में तो है ही, महाभारत में भी श्री राम के नल सेतु का जिक्र आया है। कालीदास की रघुवंश में सेतु का वर्णन है। अनेक पुराणों में भी श्रीरामसेतु का विवरण आता है।एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका में इसे राम सेतु कहा गया है।

नासा और भारतीय सेटेलाइट से लिए गए चित्रों में धनुषकोडि से जाफना तक जो एक पतली सी द्वीपों की रेखा दिखती है, उसे ही आज रामसेतु के नाम से जाना जाता है। इसी पुल को बाद में एडम्स ब्रिज का नाम मिला।

 यह सेतु तब पांच दिनों में ही बन गया था। इसकी लंबाई 100  योजन व चौड़ाई 10 योजन थी। इसे बनाने में उच्च तकनीक का प्रयोग किया गया था।


💐रामेश्वरम् शहर और रामनाथजी का प्रसिद्ध मंदिर इस टापू के उत्तर के छोर पर है। टापू के दक्षिणी कोने में धनुषकोटि नामक तीर्थ है, जहां हिंद महासागर से बंगाल की खाड़ी मिलती है। इसी स्थान को सेतुबंध कहते है। लोगों का विश्वास है कि श्रीराम ने लंका पर चढाई करने के लिए समुद्र पर जो सेतु बांधा था, वह इसी स्थान से आरंभ हुआ। इस कारण धनुष-कोटि का धार्मिक महत्व बहुत है। यही से कोलम्बो को जहाज जाते थे।



💐धनुषकोडी  


भारत के तमिलनाडु राज्‍य के पूर्वी तट पर रामेश्वरम द्वीप के दक्षिणी किनारे पर स्थित एक गांव/शहर है।। इसी स्थान को सेतुबंध कहते है।धनुषकोडी पंबन के दक्षिण-पूर्व में स्थित है। धनुषकोडी श्रीलंका में तलैमन्‍नार से करीब 18 मील पश्‍चिम में है। पंबन से प्रारंभ होने वाली धनुषकोडी रेल लाइन 1964 के तूफान में नष्‍ट हो गया था और 100 से अधिक यात्रियों वाली रेलगाड़ी समुद में डूब गई थी। 1964 का चक्रवात   हालांकि रामेश्‍वरम और धनुषकोडी के बीच एक रेलवे लाहन थी और एक यात्री रेलगाड़ी नियमित रूप से चलती थी, तूफान के बाद रेल की पटारियां क्षतिग्रस्‍त हो गईं और कालांतर में, बालू के टीलों से ढ़क गईं और इस प्रकार विलुप्‍त हो गई। कोई व्‍यक्ति धनुषकोडी या तो बालू के टीलों पर समुद तट के किनारे से पैदल, मछुआरों की जीप या टेम्‍पो से पहुंच सकते है। भगवान राम से संबंधित यहां कई मंदिर हैं। यह सलाह दी जाती है कि गांव में समूहों में दिन के दौरान जाएं और सूर्यास्‍त से पहले रामेश्‍वरम लौट आएं क्‍योंकि पूरा 15 किमी का रास्‍ता सुनसान और रहस्‍यमय है! पर्यटन इस क्षेत्र में उभर रहा है। भारतीय नौसेना ने भी अग्रगामी पर्यवेक्षण चौकी की स्‍थापना समुद्र की रक्षा के लिए की है। और हैं और यात्रियों की सुरक्षा के लिए पुलिस की उपस्‍थिति महत्‍वपूर्ण है। धनुषकोडी में हम भारतीय महासागर के गहरे और उथले पानी को बंगाल की खाड़ी के छिछले और शांत पानी से मिलते हुए देख सकता है। चूंकि समुद यहां छिछला है, तो आप बंगाल की खाड़ी में जा सकते हैं और रंगीन मूंगों, मछलियों, समुद्री शैवाल, स्टार मछलियों और समुद्र ककड़ी आदि को देख सकते हैं।वर्तमान में, औसनत, करीब 500 तीर्थयात्री प्रतिदिन धनुषकोडी आते हैं और त्‍योहार और पूर्णिमा के दिनों में यह संख्‍या हजारों में हो जाती है, जैसे नए . निश्‍चित दूरी तक नियमित रूप से बस की सुविधा रामेश्वरम से कोढ़ान्‍डा राम कोविल (मंदिर) होते हुए उपलब्ध है और कई तीर्थयात्री को, जो धनुषकोडी में पूर्जा अर्चना करना चाहते हैं, निजी वैनों पर निर्भर होना पड़ता है । संपूर्ण देश से रामेश्‍वरम जाने वाले तीर्थयात्रियों की मांग के अनुसार, 2003 में, दक्षिण रेलवे ने रेल मंत्रालय को रामेश्‍वरम से धनुषकोडी के लिए 16 किमी के रेलवे लाइन को बिछाने का प्रोजेक्‍ट रिपोर्ट भेजा है।धनुषकोडी ही भारत और श्रीलंका के बीच केवल स्‍थलीय सीमा है जो जलसन्धि में बालू के टीले पर सिर्फ 50 गज की लंबाई में विश्‍व के लघुतम स्‍थानों में से एक है। 1964 के चक्रवात से पहले, धनुषकोडी एक उभरता हुआ पर्यटन और तीर्थ स्‍थल था। चूंकि सीलोन (अब श्रीलंका) केवल 18 मील दूर है, धनुषकोडी और सिलोन के थलइमन्‍नार के बीच यात्रियों और सामान को समुद्र के पार ढ़ोने के लिए कई साप्‍ताहिक फेरी सेवाएं थीं। इन तीर्थयात्रियों और यात्रियों की आवश्‍यकताओं की पूर्ति के लिए वहां होटल, कपड़ों की दुकानें और धर्मशालाएं थी। धनुषकोडी के लिए रेल लाइन- जो तब रामेश्‍वरम नहीं जाती थी और जो 1964 के चक्रवात में नष्‍ट हो गई- सीधे मंडपम से धनुषकोडी जाती थी। उन दिनों धनुषकोडी में रेलवे स्‍टेशन, एक लघु रेलवे अस्‍पताल, एक पोस्‍ट ऑफिस और कुछ सरकारी विभाग जैसे मत्‍स्‍य पालन आदि थे। यह इस द्वीप पर जनवरी 1897में तब तक था, जब स्‍वामी विवेकानंद सितंबर 1893 में यूएसए में आयोजित धर्म संसद में भाग लने के लेकर पश्‍चिम की विजय यात्रा के बाद अपने चरण कोलंबो से आकर इस भारतीय भूमि पर रखे।


💐गंधमादन पर्वत

रामेश्वरम् शहर से करीब डेढ़ मील उत्तर-पूर्व में गंधमादन पर्वत नाम की एक छोटी-सी पहाड़ी है। हनुमानजी ने इसी पर्वत से समुद्र को लांघने के लिए छलांग मारी थी। बाद में राम ने लंका पर चढ़ाई करने के लिए यहीं पर विशाल सेना संगठित की थी। इस पर्वत पर एक सुंदर मंदिर बना हुआ है, जहां श्रीराम के चरण-चिन्हों की पूजा की जाती है। इसे पादुका मंदिर कहते हैं।


💐रामेश्वरम् की यात्रा करनेवालों को हर जगह राम-कहानी की गूंज सुनाई देती है। रामेश्वरम् के विशाल टापू का चप्पा-चप्पा भूमि राम की कहानी से जुड़ी हुई है। किसी जगह पर राम ने सीता जी की प्यास बुझाने के लिए धनुष की नोंक से कुआं खोदा था, तो कहीं पर उन्होनें सेनानायकों से सलाह की थी। कहीं पर सीताजी ने अग्नि-प्रवेश किया था तो किसी अन्य स्थान पर श्रीराम ने जटाओं से मुक्ति पायी थी। ऐसी सैकड़ों कहानियां प्रचलित है। यहां राम-सेतु के निर्माण में लगे ऐसे पत्थर भी मिलते हैं, जो पानी पर तैरते हैं। मान्यता अनुसार नल-नील नामक दो वानरों ने उनको मिले वरदान के कारण जिस पाषाण शिला को छूआ, वो पानी पर तैरने लगी और सेतु के काम आयी। एक अन्य मतानुसार ये दोनों सेतु-विद्या जानते थे।


रामेश्वर के मंदिर में जिस प्रकार शिवजी की दो मूर्तियां है, उसी प्रकार देवी पार्वती की भी मूर्तियां अलग-अलग स्थापित की गई है। देवी की एक मूर्ति पर्वतवर्द्धिनी कहलाती है, दूसरी विशालाक्षी। मंदिर के पूर्व द्वार के बाहर हनुमान की एक विशाल मूर्ति अलग मंदिर में स्थापित है।


💐सेतु माधव


रामेश्वरम् का मंदिर है तो शिवजी का, परन्तु उसके अंदर कई अन्य मंदिर भी है। सेतुमाधव का कहलानेवाले भगवान विष्णु का मंदिर इनमें प्रमुख है।


💐22 बाईस कुण्ड तिर्थम्


रामनाथ के मंदिर के अंदर और परिसर में अनेक पवित्र तीर्थ है। ‘कोटि तीर्थ’ जैसे एक दो तालाब भी है। रामनाथ स्वामी मंदिर के बारे में मान्यता है कि यहां स्थित अग्नि तीर्थम में जो भी श्रद्धालु स्नान करते है उनके सारे पाप धुल जाते हैं। इस तीर्थम से निकलने वाले पानी को चमत्कारिक गुणों से युक्त माना जाता है। यह 274 पादल पत्र स्थलम् में से एक है, जहाँ तीनो श्रद्धेय नारायण अप्पर, सुन्दरर और तिरुग्नना सम्बंदर ने अपने गीतों से मंदिर को जागृत किया था। जो शैव, वैष्णव और समर्थ लोगो के लिए एक पवित्र तीर्थस्थल माना जाता है। भारत के तमिलनाडु राज्य के रामेश्वरम द्वीप पर और इसके आस-पास कुल मिलाकर 64 तीर्थ है। स्कंद पुराण के अनुसार, इनमे से 24 ही महत्वपूर्ण तीर्थ है। इनमे से 22 तीर्थ तो केवल रामानाथस्वामी मंदिर के भीतर ही है। 22 संख्या को भगवान की 22 तीर तरकशो के समान माना गया है। मंदिर के पहले और सबसे मुख्य तीर्थ को अग्नि तीर्थं नाम दिया गया है। इन तीर्थो में स्नान करना बड़ा फलदायक पाप-निवारक समझा जाता है। जिसमें श्रद्धालु पूजा से पहले स्नान करते हैं। हालांकि ऐसा करना अनिवार्य नहीं है।


💐रामेश्वरम के इन तीर्थो में नहाना काफी शुभ माना जाता है और इन तीर्थो को भी प्राचीन समय से काफी प्रसिद्ध माना गया है। वैज्ञानिक का कहना है कि इन तीर्थो में अलग-अलग धातुएं मिली हुई है। इस कारण उनमें नहाने से शरीर के रोग दूर हो जाते है और नई ताकत आ जाती है।


💐विल्लीरणि तीर्थ


रामेश्वरम् के मंदिर के बाहर भी दूर-दूर तक कई तीर्थ है। प्रत्येक तीर्थ के बारें में अलग-अलग कथाएं है। यहां से करीब तीन मील पूर्व में एक गांव है, जिसका नाम तंगचिमडम है। यह गांव रेल मार्ग के किनारे हो बसा है। वहां स्टेशन के पास समुद्र में एक तीर्थकुंड है, जो विल्लूरणि तीर्थ कहलाता है। समुद्र के खारे पानी बीच में से मीठा जल निकलता है, यह बड़े ही अचंभे की बात है। कहा जाता है कि एक बार सीताजी को बड़ी प्यास लगी। पास में समुद्र को छोड़कर और कहीं पानी न था, इसलिए राम ने अपने धनुष की नोक से यह कुंड खोदा था।


💐एकांत राम

तंगचिडम स्टेशन के पास एक जीर्ण मंदिर है। उसे ‘एकांत’ राम का मंदिर कहते है। इस मंदिर के अब जीर्ण-शीर्ण अवशेष ही बाकी हैं। रामनवमी के पर्व पर यहां कुछ रौनक रहती है। बाकी दिनों में बिलकुल सूना रहता है। मंदिर के अंदर श्रीराम, लक्ष्मण, हनुमान और सीता की बहुत ही सुंदर मूर्तिया है। धुर्नधारी राम की एक मूर्ति ऐसी बनाई गई है, मानो वह हाथ मिलाते हुए कोई गंभीर बात कर रहे हो। दूसरी मूर्ति में राम सीताजी की ओर देखकर मंद मुस्कान के साथ कुछ कह रहे है। ये दोनों मूर्तियां बड़ी मनोरम है। यहां सागर में लहरें बिल्कुल नहीं आतीं, इसलिए एकदम शांत रहता है। शायद इसीलिए इस स्थान का नाम एकांत राम है।


💐कोद्ण्ड स्वामि मंदिर


रामेश्वरम् के टापू के दक्षिण भाग में, समुद्र के किनारे, एक और दर्शनीय मंदिर है। यह मंदिर रमानाथ मंदिर से पांच मील दूर पर बना है। यह कोदंड ‘स्वामी का मंदिर’ कहलाता है। कहा जाता है कि विभीषण ने यहीं पर राम की शरण ली थी। रावण-वध के बाद राम ने इसी स्थान पर विभीषण का राजतिलक कराया था। इस मंदिर में राम, सीता और लक्ष्मण की मूर्तियां के साथ ही विभीषण की भी मूर्ति स्थापित है।

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सीता कुण्ड


रामेश्वरम् को घेरे हुए समुद्र में भी कई विशेष स्थान ऐसे बताये जाते है, जहां स्नान करना पाप-मोचक माना जाता है। रामनाथजी के मंदिर के पूर्वी द्वार के सामने बना हुआ सीताकुंड इनमें मुख्य है। कहा जाता है कि यही वह स्थान है, जहां सीताजी ने अपना सतीत्व सिद्व करने के लिए आग में प्रवेश किया था। सीताजी के ऐसा करते ही आग बुझ गई और अग्नि-कुंड से जल उमड़ आया। वही स्थान अब ‘सीताकुंड’ कहलाता है। यहां पर समुद्र का किनारा आधा गोलाकार है। सागर एकदम शांत है। उसमें लहरें बहुत कम उठती है। इस कारण देखने में वह एक तालाब-सा लगता है। यहां पर बिना किसी खतरें के स्नान किया जा सकता है। यहीं हनुमान कुंड में तैरते हुए पत्थर भी दिखाई देते हैं।


💐आदि-सेतु


रामेश्वरम् से सात मील दक्षिण में एक स्थान है, जिसे ‘दर्भशयनम्’ कहते है; यहीं पर राम ने पहले समुद्र में सेतु बांधना शुरू किया था। इस कारण यह स्थान आदि सेतु भी कहलाता है।


रामसेतु


पूरे भारत, दक्षिण पूर्व एशिया और पूर्व एशिया के कई देशों में हर साल दशहरे पर और राम के जीवन पर आधारित सभी तरह के नृत्य-नाटकों में सेतु बंधन का वर्णन किया जाता है। राम के बनाए इस पुल का वर्णन रामायण में तो है ही, महाभारत में भी श्री राम के नल सेतु का उल्लेख आया है। कालीदास की रघुवंश में सेतु का वर्णन है। अनेक पुराणों में भी श्रीरामसेतु का विवरण आता है। एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका मे राम सेतु कहा गया है। नासा और भारतीय सेटेलाइट से लिए गए चित्रों में धनुषकोडि से जाफना तक जो एक पतली सी द्वीपों की रेखा दिखती है, उसे ही आज रामसेतु के नाम से जाना जाता है। यह सेतु तब पांच दिनों में ही बन गया था। इसकी लंबाई 100 योजन व चौड़ाई 10 योजन थी। इसे बनाने में रामायण काल में श्री राम नाम के साथ, उच्च तकनीक का प्रयोग किया गया था।


फोटो :  मुख्य मंदिर,  मंदिर का गलियारा,  अग्नि तीर्थम् (मंदिर के सामने वाला समुद्र, जहाँ सर्वप्रथम स्नान किया जाता है) , सेतु समुद्रम्  (सेटेलाइट चित्र)

Jay Ma Meenakshi

 🚩Jay Ma Meenakshi 🚩

🏵️  जय मां मीनाक्षी  🏵️



चलिये आज मीनाक्षी मन्दिर किंवा, मीनाक्षी अम्मां मन्दिर  जहाँ भगवान शिव और मां मीनाक्षी (पार्वती ) की विवाह हुआ था।



भारत की तमिलनाडु राज्य में मदुरई नगर, में स्थित ये एक भव्य ऐतिहासिक मन्दिर है। भगवान शिव एवं  देवी पार्वती  (मीनाक्षी यानी  मछली आकार की आंख वाली देवी के रूप में) समर्पित ये मंदिर अत्यधिक सुन्दर मनोरम है।

 


ध्यान देने योग्य बात ये है कि मछली पांड्य राजा लोगो की  राजचिह्न था।ये मन्दिर तमिल भाषा की गृहस्थान 2500 वर्ष पुरानी मदुरई नगर की जीवनरेखा माना जाता है ।


कांची तु कामाक्षी, मदुरै मिनाक्षी,

दक्षिणे कन्याकुमारी ममः शक्ति रूपेण भगवती,

नमो नमः नमो नमः।।

💐इस मन्दिर का स्थापत्य एवं वास्तु आश्चर्यचकित कर देने वाला है, जिस कारण यह आधुनिक विश्व के सात आश्चर्यों की सूची में प्रथम स्थान पर स्थित है, एवं इसका कारण इसका विस्मयकारक स्थापत्य ही है।

इस इमारत समूह में 12 भव्य गोपुरम हैं, जो अतीव विस्तृत रूप से शिल्पित हैं।


💐पौराणिक कथा

हिन्दू आलेखों के अनुसार, भगवान शिव पृथ्वी पर सुन्दरेश्वरर के रूप में स्वयं देवी पार्वती अर्थात् मीनाक्षी से विवाह रचाने अवतरित हुए थे। देवी पार्वती ने पूर्व में पाँड्य राजा मलयध्वज, मदुरई के राजा की घोर तपस्या के फलस्वरूप उनके घर में एक पुत्री के रूप में अवतार लिया था।  वयस्क होने पर उसने नगर का शासन संभाला। तब भगवान आये और उनसे विवाह प्रस्ताव रखा, जो उन्होंने स्वीकार कर लिया। इस विवाह को विश्व की सबसे बडी़ घटना माना गया, जिसमें लगभग पूरी पृथ्वी के लोग मदुरई में एकत्र हुए थे। भगवान विष्णु स्वयं, अपने निवास बैकुण्ठ से इस विवाह का संचालन करने आये। ईश्वरीय लीला अनुसार इन्द्र के कारण उनको रास्ते में विलम्ब हो गया। इस बीच विवाह कार्य स्थानीय देवता कूडल अझघ्अर द्वारा संचालित किया गया। बाद में क्रोधित भगवान विष्णु आये और उन्होंने मदुरई शहर में कदापि ना आने की प्रतिज्ञा की। और वे नगर की सीमा से लगे एक सुन्दर पर्वत अलगार कोइल में बस गये। बाद में उन्हें अन्य देवताओं द्वारा मनाया गया, एवं उन्होंने मीनाक्षी-सुन्दरेश्वरर का पाणिग्रहण कराया।


💐यह विवाह एवं भगवान विष्णु को शांत कर मनाना, दोनों को ही मदुरई के सबसे बडे़ त्यौहार के रूप में मनाया जाता है, जिसे चितिरई तिरुविझा  या अझकर तिरुविझा, यानि सुन्दर ईश्वर का त्यौहार ।


इस दिव्य युगल द्वारा नगर पर बहुत समय तक शासन किया गया। यह वर्णित नहीं है, कि उस स्थान का उनके जाने के बाद्, क्या हुआ? यह भी मना जाता है, कि इन्द्र को भगवान शिव की मूर्ति शिवलिंग रूप में मिली और उन्होंने मूल मन्दिर बनवाया। इस प्रथा को आज भी मन्दिर में पालन किया जाता है ― त्यौहार की शोभायात्रा में इन्द्र के वाहन को भी स्थान मिलता है।



💐आधुनिक इतिहास

आधुनिक ढांचे का इतिहास सही सही अभी ज्ञात नहीं है, किन्तु तमिल साहित्य के अनुसार, कुछ शताब्दियों पहले का बताया जाता है। तिरुज्ञानसंबन्दर, प्रसिद्ध हिन्दू शैव मतावलम्बी संत ने इस मन्दिर को आरम्भिक सातवीं शती का बताया है औरिन भगवान को आलवइ इरैवान कह है। इस मन्दिर में मुस्लिम शासक मलिक कफूर ने 1310 में खूब लूटपाट की थी। और इसके प्राचीन घटकों को नष्ट कर दिया। फिर इसके पुनर्निर्माण का उत्तरदायित्व आर्य नाथ मुदलियार (1559-1600 A.D.), मदुरई के प्रथम नायक के प्रधानमन्त्री, ने उठाया। वे ही 'पोलिगर प्रणाली' के संस्थापक थे। फिर तिरुमलय नायक, लगभग 1623 से 1659 का सर्वाधिक मूल्यवान योगदान हुआ। उन्होंने मन्दिर के वसंत मण्डप के निर्माण में उल्लेखनीय उत्साह दिखाया


💐मन्दिर का ढाँचा

इस मन्दिर का गर्भगृह 3500 वर्ष पुराना  है, इसकी बाहरी दीवारें और अन्य बाहरी निर्माण लगभग 1500-2000 वर्ष पुराने  हैं। इस पूरे मन्दिर का भवन समूह लगभग 45 एकड़ भूमि में बना है, जिसमें मुख्य मन्दिर भारी भरकम निर्माण है और उसकी लम्बाई 254मी एवं चौडा़ई 237 मी है। मन्दिर बारह विशाल गोपुरमों से घिरा है, जो कि उसकी दो परिसीमा भीत (चार दीवारी) में बने हैं। इनमें दक्षिण द्वार का गोपुरम सर्वोच्च है।

🙏जय मां मीनाक्षी  , जय बाबा भोलेनाथ 🙏🌺जय हो विष्‍णु 🌺🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩

09 मार्च 2023

temple hanuman hampi

 yantrodharaka hanuman hampi

🚩 Jay Bajrangi - Jay SriRam 🚩 🙏जय बजरंगी - जय  श्रीराम 🙏   



चलिये  हंपी कर्नाटक ,जहाँ भगवान श्रीराम पहली बार श्री हनुमानजी से मिले थे, ।  

विरुपाक्ष मंदिर से मात्र  2 किमी दूर - द्वैत दार्शनिक ओर विजयनगर साम्राज्य की राजगुरु, श्री व्यासराजा द्वारा लगभग 500 साल पूर्व निर्मित यंत्रोधारक हनुमान मंदिर है। मंदिर हम्पी में भगवान श्रीहनुमान के समर्पित दूसरी सबसे विशाल तथा महत्वपूर्ण मंदिर है।





विशेष जानकारी :-

ऐसा कहा जाता है कि श्री व्यासराजा प्रतिदिन प्रार्थना करने से पहले चट्टानों पर भगवान हनुमान की एक तस्वीर चारकोल का उपयोग करके बनाते थे और अनुष्ठान पूरा होने के बाद तस्वीर गायब हो जाती थी। माना जाता है कि यन्त्रोढारक मंदिर वह स्थान है जहाँ रामायण काल ​​में श्री राम और हनुमान पहली बार मिले थे। यह अन्य 732 हनुमान मूर्ति प्रतिष्ठानों में से श्री व्यासराजा द्वारा स्थापित पहली स्थापना है। पहाड़ी की चोटी पर और तुंगभद्रा नदी के तट पर स्थित , नदी का एक हिस्सा दिव्य भूमि में प्रवाहित होता है जिसे चक्रतीर्थ के नाम से जाना जाता है।



प्रसिद्ध यंत्रोद्धारक हनुमान स्तोत्रम मंदिर में लिखा गया था और यह माना जाता है कि यहां के भक्त छह महीने तक दिन में तीन बार अपनी मनोकामना पूरी करते हैं। उपलब्ध भगवान हनुमान की मूर्ति एक ध्यान अवस्था में है और मूर्ति एक हेक्सागोनल ताबीज के साथ घूमती है। मूर्ति 12 बंदरों की मूर्तियों से घिरी हुई है जो 12 दिनों की प्रार्थना को समझाती है । ताबीज के अंदर वे बीज अक्षर हैं जिन पर महान तपस्वी ने एक बार प्रार्थना की थी। यह सब एक ही सपाट पत्थर के शिलाखंड पर बनाया गया है जिसकी ऊंचाई लगभग 8 फीट है।


यन्त्रोधरका मंदिर से करीब 5 मिनट की पैदल दूरी पर भगवान श्रीनिवास (भगवान विष्णु के अवतार) को समर्पित एक छोटा मंदिर है , जिसकी मूर्ति स्वयं श्री व्यासराजा ने बनाई है।          🚩🚩🚩🚩🚩

dwarkadhish

 dwarkadhish temple

🏵️ Jay Sri Krishna 🏵️

🙏जय श्रीकृष्ण 🙏



💐आज चलिये श्रीकृष्ण के नगरी द्वारका गुजरात, जानते है इनकी इतिहास और द्वारकाधीश मंदिर की विशेषता...


dwarkadhish photo

💐द्वारका, गुजरात, गोमती नदी की तट पर स्थित है, शहर के पौराणिक कथा में कृष्णा की राजधानी के रूप में वर्णित किया गया है ।  यहाँ ऐतिहासिक बंदरगाह भी था,जो तटीय कटाव के कारण नष्ट हो गया ।                   


shree dwarkadhish temple

💐 प्रस्तुत है श्रीकृष्ण जी की संस्मरण  तथा अन्य  स्त्रोत आधारित  विस्तृत जानकारी :-

💐हिंदुओं का मानना ​​है कि मूल मंदिर का निर्माण कृष्ण के परपोते वज्रनाभ ने कृष्ण के आवासीय महल के ऊपर किया था। जिसे 1472 में सुल्तान महमूद बेगड़ा ने नष्ट कर दिया था। 


चालुक्य शैली में वर्तमान मंदिर का निर्माण 15-16वीं शताब्दी में किया गया था। यह मंदिर 27 मीटर x 21 मीटर के क्षेत्र में फैला  है, पूर्व-पश्चिम लंबाई 29 मीटर और उत्तर-दक्षिण चौड़ाई 23 मीटर है। मंदिर की सबसे ऊंची चोटी 51.8 मीटर ऊंची है।

चूंकि यह स्थल द्वारका के प्राचीन शहर और महाभारत के वैदिक युग कृष्ण से जुड़ा हुआ है , इसलिए यह हिंदुओं के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थान है । 


मंदिर के ऊपर स्थित ध्वज सूर्य और चंद्रमा को दर्शाता है, जिसके बारे में माना जाता है कि कृष्ण तब तक रहेंगे जब तक सूर्य और चंद्रमा पृथ्वी पर मौजूद रहेंगे। झंडे को दिन में पांच बार तक बदला जाता है, लेकिन प्रतीक वही रहता है। मंदिर में बहत्तर खंभों पर बनी पांच मंजिला संरचना है। मंदिर का शिखर 78.3 मीटर ऊंचा है।  मंदिर का निर्माण चूना पत्थर से किया गया है जो अभी भी प्राचीन स्थिति में है। मंदिर इस क्षेत्र पर शासन करने वाले राजवंशों के उत्तराधिकारियों द्वारा किए गए जटिल मूर्तिकला विवरण दिखाता है। इन कार्यों से संरचना का अधिक विस्तार नहीं हुआ।


💐मंदिर में दो प्रवेश द्वार हैं। मुख्य प्रवेश द्वार (उत्तर प्रवेश द्वार) को "मोक्ष द्वार"  कहा जाता है। यह प्रवेश द्वार एक को मुख्य बाजार तक ले जाता है। दक्षिण प्रवेश द्वार को "स्वर्ग द्वार" कहा जाता है। इस द्वार के बाहर 56 सीढ़ियाँ हैं जो गोमती नदी की ओर जाती हैं। मंदिर सुबह 6.00 बजे से दोपहर 1.00 बजे तक और सायं 5.00 से 9.30 बजे तक खुला रहता है। कृष्ण जन्माष्टमी त्योहार, या गोकुलाष्टमी, कृष्ण का जन्मदिन वल्लबा (1473-1531) द्वारा शुरू किया गया था। 


💐कहा जाता है कि प्रसिद्ध राजपूत राजकुमारी मीरा बाई , जो एक कवयित्री-संत और कृष्ण की कट्टर भक्त भी थीं, इस मंदिर में देवता के साथ विलीन हो गईं। यह भारत के सात पवित्र शहरों सप्त पुरी में से एक है। 


💐मंदिर द्वारका पीठ का स्थान भी है, जो आदि शंकराचार्य (686-717) द्वारा स्थापित चार पीठों (धार्मिक केंद्रों) में से एक है, जिन्होंने देश में हिंदू धार्मिक मान्यताओं के एकीकरण का बीड़ा उठाया था। यह चार मंजिला संरचना है जो देश के विभिन्न हिस्सों में शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार पीठों का प्रतिनिधित्व करती है। यहां की दीवारों पर शंकराचार्य के जीवन के इतिहास को दर्शाने वाले चित्र हैं जबकि गुंबद में विभिन्न मुद्राओं में शिव की नक्काशी है। 


💐यह एक पांच मंजिला इमारत है जो 72 स्तंभों पर बनी है (60 स्तंभों वाले बलुआ पत्थर के मंदिर का भी उल्लेख है) । मूल मंदिर का निर्माण कृष्ण के पोते ने हरिग्रह, कृष्ण के महल के ऊपर किया था। मंदिर में एक सभा हॉल या दर्शक हॉल है।  मंदिर में दो महत्वपूर्ण प्रवेश द्वार हैं, एक मुख्य प्रवेश द्वार है जिसे मोक्ष द्वार कहा जाता है और निकास द्वार जिसे स्वर्ग द्वार के रूप में जाना जाता है । 


💐गर्भगृह में विराजमान मुख्य देवता द्वारकादीश के हैं, जिन्हें विष्णु के त्रिविक्रम रूप के रूप में जाना जाता है और चार भुजाओं के साथ चित्रित किया गया है।  मुख्य वेदी के बाईं ओर के कक्ष में कृष्ण के बड़े भाई बलराम के देवता हैं। दायीं ओर के कक्ष में कृष्ण के पुत्र और पोते प्रद्युम्न और अनिरुद्ध की छवियां हैं । केंद्रीय मंदिर के आसपास के कई मंदिरों में देवी राधा , जाम्बवती , सत्यभामा और लक्ष्मी की मूर्तियाँ हैं । माधव रावजी (कृष्ण का दूसरा नाम), बलराम और ऋषि दुर्वासा के मंदिरमंदिर में भी मौजूद है। 


💐द्वारकाधीश के केंद्रीय मंदिर के ठीक सामने राधा कृष्ण और देवकी को समर्पित दो अलग-अलग मंदिर भी हैं ।


💐मंदिर का शिखर 78 मीटर (256 फीट) की ऊंचाई तक बढ़ता है और उस पर सूर्य और चंद्रमा के प्रतीकों वाला एक बहुत बड़ा झंडा फहराया जाता है।  तिकोने आकार का झंडा, 50 फीट (15 मीटर) लंबा है। इस झंडे को दिन में चार पांच बार एक नए झंडे के साथ बदला जाता है। एक नया झंडा खरीदकर फहराने के लिए मोटी रकम चुकाते हैं। इस खाते से प्राप्त धन को मंदिर के संचालन और रखरखाव के खर्च को पूरा करने के लिए मंदिर के ट्रस्ट फंड में जमा किया जाता है। 


💐इस मंदिर से कुछ कि०मी० दुर रूक्मिणी मंदिर है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार , द्वारका को कृष्ण द्वारा भूमि के एक टुकड़े पर बनाया गया था जिसे समुद्र से पुनः प्राप्त किया गया था। ऋषि दुर्वासा एक बार कृष्ण और उनकी पत्नी रुक्मिणी के पास गए । ऋषि की इच्छा थी कि कृष्ण अौर रूक्मिनी  उन्हें अपने महल में ले जाए। वे तुरंत राजी हो गये और ऋषि के साथ अपने महल की ओर चलने लगे। कुछ दूर चलने के बाद रुक्मिणी थक गई और उसने कृष्ण से कुछ पानी मांगा। कृष्ण ने एक पौराणिक गड्ढा खोदा, जो गंगा नदी को उस स्थान पर ले आया। ऋषि दुर्वासा क्रोधित हो गए और उन्होंने रुक्मिणी को उसी स्थान पर रहने का शाप दे दिया। जिस मंदिर में रुक्मिणी का मंदिर पाया जाता है, वह उस स्थान पर माना जाता है जहां वह खड़ी थी।


💐द्वारकाधीश जगत मंदिर को विश्व प्रतिभा संगठन , न्यू जर्सी, यूएसए द्वारा 22 मार्च 2021 को "वर्ल्ड अमेजिंग प्लेस" के प्रमाण पत्र से सम्मानित किया गया । 💐


🚩🚩🚩  जय श्रीकृष्ण  🚩🚩🚩

01 मार्च 2023

Maithili vivah vidhi

 

सबसॅ अद्भुत मैथिल विवाह क परम्परा और विधि व्यवहार



पूरे भारतवर्ष में शादी की अनोखी प्रथा होती है। मिथिलांचल जो माता सीता की जन्मभूमि है। वहां अभी भी वर को काफी आदर सम्मान दिया जाता है। पहले प्रथा ये थी कि लड़के को कम से कम 1 महीना अपने ससुराल रहना पड़ता था। लड़के की विदाई का मुहुर्त निकालने के बाद लड़का अपने घर जा सकता है। परंतु लड़की बिना गौना के अपने ससुराल नहीं जा सकती। लेकिन आज भागदौड़ के युग में ये संभव नहीं है कि लड़का इतने दिन अपने ससुराल रहे, इसलिए समय अभाव के कारण लड़के की विदाई जल्दी ही हो जाती है।

शादी में सबसे पहले वर जब वधु के द्वार पर आता है तो वर को सभी के समक्ष अपने वस्त्र बदलने पड़ते हैं ताकि वर को कोई शारीरिक दोष तो नहीं? फिर विधकरी-एक अनुभवी महिला जिस पर सभी विधि व्यवहार करवाने का जिम्मा होता है। उसके द्वारा परिछन (परीक्षण) के दौरान उससे गृहस्थ जीवन के व्यवहारिक प्रश्न पूछे जाते हैं।

कोहबर में नैना -जोगिन- जिसमे भावी पत्नी और साली को बिना देखे जो कि कपड़े से ढ़की होती है। उसमें से अपनी पत्नी को पहचानना होता है। इसमे लोगों का काफ़ी मनोरंजन तो होता ही है साथ में वर की पारखी नजर समझ में आती है। उसके बाद समाज परिवार के बुजुर्गों के साथ मिल कर ओठंगर कुटा जाता है यानि पूरे समाज की स्वीकृति के साथ गृहस्त जीवन में प्रवेश की अनुमति- चाहे ओठंगर कूटना हो या भाई के साथ मिल कर धान का लावा छीटना, उन तमाम रिवाजों के पीछे कोई न कोई व्यवहारिक तर्क होता है- फिर आम की कच्ची लकड़ियों को प्रज्वलित कर उसके समक्ष मन्त्रें द्वारा विवाह संपन्न करवाया जाता है उस अग्नि पर ही ओठंगर में कुटे धान के चावल से वर खीर बनाता है अर्थात गृहस्तथी में पूर्ण सहयोग की तैयारी- वधु का प्रथम सिंदूर दान अलग सिंदूर (भुसना) से किया जाता है। मतलब अभी वर की परीक्षा संपन्न नहीं हुई है! इसके बाद चौठारी (यानि शादी के चौथे) दिन तक वर एवं वधू नमक का सेवन नहीं करते हैं।

इय विवाह के बाद वर वधू कोहबर के कमरे में जाते हैं। कोहबर को आकर्षक चित्रें द्वारा सजाया जाता है जिसमें सांकेतिक रूप से गृहस्थ जीवन के महत्व को दिखाया जाता है। कोहबर में विधकारी वधू को लेकर आती है और वर-वधू का परिचय कराती है। अगले तीन दिन तक यही कार्यक्रम चलता है। वर-वधू सिर्फ विधकरी के माध्यम से ही मिलते हैं।

चूकि मिथिला प्रभू श्रीराम का ससुराल था इसलिए ये सारी रीति रवाज सदियों से मिथिला की संस्कृति का हिस्सा हैं। दामाद को मिथिला में बहुत ही आदर दिया जाता है। पूरे गांव स्वागत-सत्कार में लगा रहता है। कि कहीं किसी चीज की दिक्कत तो वर को नहीं हो रही है। हास-परिहास का मिथिला में काफी ज्यादा महत्व है। मधुर-मधुर गालियों जब लड़की वाले लड़के के परिवार को देते हैं। तो वर भी उसका बुरा नहीं मानते ये रीति-रिवाज में शामिल होता है। शारदा सिन्हा द्वारा गाए गए मैथिली विवाह गीत शादी में चार-चांद लगा देते हैं।

अब राम विवाह के कुछ प्रसंग:

धनुष भंग हुआ सीता राम विवाह की तैयारी है। दशरथ जी को न्योता भेजा गया। बाराती मिथिला में प्रवेश कर रहे हैं। महिलाएं, लोबा और दही मछली देख कर यात्र का सगुन कर रही है। आज भी मिथिला में दही-मछली के दर्शन से ही यात्र का उत्तम योग बनता है।

चारा चाषु बाप दिसि लेई। मनहुँ सकल मंगल कहि देई।।

दाहिन काग सुखेत सुहाबा नकुल दरस सब काहूँ पावा।।

सानकूल बह त्रिबिध बयारी, सघट सबाल आव बार नारी।।

लोवा फिर-फिर दरस देखावा। सुरभि सन्मुख सिसुहि पिआवा।।

सनमुख आएऊ दाढ़ी और मीना कर पुस्तक दुई विप्र प्रवीणा।।

बालकाण्ड/दोहा-302/चौपाई-4

अवध के बारातियों का बहुत ही मधुरता के साथ स्वागत किया मिथिलांचल के लोगों ने। खाने-पीने के बहुत से पकवान एवं मीठी वाणी से अवध के लोगों का मन उल्लास से भर गया।

‘भरे सुधा सम सब पकवाने। नाना भांति न जाहीं बखाने।।

दधि-चिउरा उपहार अपारा। भरि-भरि कांवल चले कहारा।।

बालकांड/दोहा-304/चौपाई-3

बलिहारी जाऊं इस पुनीत परम्परा की। मिथिलांचल में आज भी स्वागत भोज त्रिगुणात्मिका (सत,रज,तम) प्रकृति चूरा-दही चीनी से ही किया जाता है। जनवासे पर बाराती को विश्राम दिया जाता है। विवाहोपरांत वर एवं दुल्हन को सुहाग कक्ष में सखी-सहेलियां मंगल गान करती हुई ले जाती है। वहां होती है एक दूजे की खीर-खिलाई की रस्म लहकौरी। इस खीर में वर-कन्या का एक बंद लहू मिला होता है। ऐसा कहा जाता है कि इसके खाने से परस्पर प्रीति बढ़ती है। लहू मिश्रित कौर के कारण इसे लहकौरी कहा जाता है। स्िाानीय नारी के रूप धरी गौरी राम को लहकौरी का विध समझाती है और सरस्वती सीता को।

‘कोहबरहि आने कुंवर कुअरि सुआसिनिन्ह सुख पाए कै।अति प्रीति लौककि रीति लागीं करण मंगल गई कै।

लहकौरी गौरी सिखाव रामहि सीय सन सारद कहैं।

रनिवासु हास विलास रस बस जन् को फल सब लहैं।।

फिर ज्योनार हुआ, मंगल गालियों के साथ। मिथिलावासी अवधवासियों को सरस मीठी बोली के साथ वचन सुना रही है। समधी, समधन के हास्य-परिहास। ‘ऐसन स्वाद न मिलिहैं केकैई के तरकारी में! खीर परोसल थारी में। मिथिला की तो पहचान ही है। पग-पग पोखर, माछ, मखान, सरस बोली मुस्की मुख पान। भोजनोपरांत राजा जनक समधी-समाज को पान देकर पूजते हैं। तब जाकर समधी महाराज जनवासा का रास्ता देखते हैं।


साभार: मैथिली विवाह विधि

25 फ़रवरी 2023

Krishna butter ball - कृष्ण माखन गेंद

 Krishna butter ball - कृष्ण माखन गेंद



 250 टन की पत्थर है ‘कृष्णा बटर बॉल’ यानी  कृष्णा  मक्खन गेंद 


महाबलीपुरम में स्थित एक विशालकाय ग्रेनाइड पत्थर है ,जिसको  ‘कृष्णा बटर बॉल'कहते है ।। कृष्‍णा बटर बॉल या वानिराई काल (आकाश क भगवान क पाथर) एक पहाड़ी की ऊपर स्थित है,  ये 'कृष्‍णा बटर बॉल' की ऊंचाई 20 फीट ओर  5 मीटर चौड़ा है । चट्टान की आधार 4 फीट से  भी कम है, जबकि  पहाड़ी के ढलान पर स्थित है। पत्थर की वजन लगभग 250 टन है। ये चट्टान चार फीट से  कम पहाड़ी की ढलान पर स्थित है। कृष्‍णा बॉल को  देखकर  लगता है ,ये कभी भी लुढ़क सकता है, लेकिन ये पत्थर एक ही जगहें पर टिके हुए है,इसको हटाने की प्रयास  1300 साल से हो रहा है,लेकिन सभी बार प्रयास विफल रहा। पत्थर हटाने की रिस्‍क कोई नही ले सका आजतक । ये पत्‍थर करीब 45 डिग्री की स्‍लोप पर स्थित है।



विशेष जनतब:- 

स्वर्ग से आयी हैं यह कृष्‍णा की बटर बॉल

कहा जाता है कि यह पत्थर सीधे स्वर्ग से गिरकर यहां आया है। ऐसा कहा जाता है कि यह कृष्ण के मक्खन का टुकड़ा है, जो खाते वक्त स्वर्ग से गिर गया था। इसी वजह से इस पत्थर को भगवान कृष्ण का मक्खन गेंद भी कहते हैं।  इस विशालकाय पत्थर को देखने के लिए दूर-दूर से पर्यटक महाबलीपुरम आते हैं। हिंदू धर्मावलंबियों का मानना है कि भगवान कृष्‍ण अक्सर अपनी मां के मटके से माखन चुरा लेते थे और यह प्राकृतिक पत्‍थर दरअसल, श्रीकृष्‍ण द्वारा चुराए गए मक्‍खन का ढेर है जो सूख गया है। बता दें कि महाबलीपुरम एक ऐतिहासिक शहर है जिसे ममल्लापुरम भी कहा जाता है। बंगाल की खाड़ी के किनारे बसा ये शहर 7वीं और 8वीं शताब्दी में बने अपने भव्य मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है।



प्राकृतिक आपदाएं भी हिला न सकी

पहली बार सन 630 से 668 के बीच दक्षिण भारत पर शासन करने वाले पल्‍लव शासक नरसिंह वर्मन ने इसे हटवाने का प्रयास किया। उनका मानना था कि यह पत्‍थर स्‍वर्ग से गिरा है, इसलिए मूर्तिकार इसे छू न सकें। पल्‍लव शासक का यह प्रयास विफल रहा। 250 टन वजनी पत्‍थर 'कृष्‍णा बटर बॉल' को पिछले करीब 1300 सौ वर्षों से भूकंप, सुनामी, चक्रवात समेत कई प्राकृतिक आपदाओं के बाद भी अपने स्‍थान पर बना हुआ है। यही नहीं इस पत्‍थर को हटाने के लिए कई बार मानवीय प्रयास किए गए लेकिन सभी विफल रहे। दुनियाभर से महाबलीपुरम पहुंचने वाले लोगों के लिए प्राकृतिक पत्‍थर से बना कृष्‍णा बटर बॉल को देखकर अचंभित हो जाते हैं।



सात हाथी मिलकर भी नहीं हटा सके यह पत्‍थर :-

वर्ष 1908 में ब्रिटिश शासन के दौरान मद्रास के गवर्नर आर्थर लावले ने इसे हटाने का प्रयास शुरू किया। लावले को डर था कि अगर यह विशालकाय पत्‍थर लुढ़कते हुए कस्‍बे तक पहुंच गया तो कई लोगों की जान जा सकती है। इससे निपटने के लिए गवर्नर लावले ने सात हाथियों की मदद से इसे हटाने का प्रयास शुरू किया लेकिन कड़ी मशक्‍कत के बाद भी यह पत्‍थर टस से मस नहीं हुआ। आखिरकार गवर्नर लावले को अपनी हार माननी पड़ी।


 यह पत्‍थर स्‍थानीय लोगों और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है।


कृष्‍णा की बटर बॉल पर गुरुत्‍वाकर्षण भी बेअसर

इस पत्‍थर पर गुरुत्‍वाकर्षण का भी कोई असर नहीं है। उधर, स्‍थानीय लोगों का मानना है कि या तो ईश्‍वर ने इस पत्‍थर को महाबलीपुरम में रखा था जो यह साबित करना चाहते थे कि वह कितने शक्तिशाली हैं या फिर स्‍वर्ग से इस पत्‍थर को लाया गया था। वहीं वैज्ञानिकों का मानना है कि यह चट्टान अपने प्राकृतिक स्‍वरूप में है। भूवैज्ञानिकों का मानना है कि धरती में आए प्राकृतिक बदलाव की वजह से इस तरह के असामान्‍य आकार के पत्‍थर का जन्‍म हुआ है।

वर्तमान समय में विज्ञान के इतना प्रगति करने के बाद भी अब तक यह पता नहीं चल पाया है कि 4 फीट के बेस पर यह 250 टन का पत्‍थर कैसे टिका हुआ है। कुछ लोगों का यह दावा है कि पत्‍थर के न लुढ़कने की वजह घर्षण और गुरुत्‍वाकर्षण है। उनका कहना है कि घर्षण जहां इस पत्‍थर को नीचे फिसलने से रोक रहा है, वहीं गुरुत्‍कार्षण का केंद्र इस पत्‍थर को 4 फीट के बेस पर टिके रहने में मदद कर रहा है।

mahalakshmi

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चेन्नई के महालक्ष्मी-अष्टलक्ष्मी 




महालक्ष्मी 'ऊँ' के आकार वाली ओर 'इ' अष्टलक्ष्मी के  दरबार है, जहाँ दर्शन मात्र दे दुःख दूर हो जाते है,माँ अष्टलक्ष्मी  अपनी आठों  रुप में विराजमान है यहाँ ।  अष्टलक्ष्मी (लक्ष्मी क आठ रूप) मंदिर हैं। देवी लक्ष्मी के आठ रूप आदिलक्ष्मी, धनलक्ष्मी, धान्यलक्ष्मी, गजलक्ष्मी, संतानलक्ष्मी, वीरलक्ष्मी, आ विजयलक्ष्मी है।



अष्टलक्ष्मी की दर्शन से ही धन, विद्या, वैभव, शक्ति ओर सुख की प्राप्ति हो जाते है।

 अपनी संस्मरण ओर अन्य स्त्रोत  से सब कुछ पा सकते है ।।

भारत में देवी लक्ष्मी के कई मंदिरें हैं, उनमें से चेन्नई के अडयार में स्थित महालक्ष्मी का मंदिर सबसे खास है। इस मंदिर में देवी लक्ष्मी के 8 स्वरूपों की प्रतीमा स्थापित है। इस मंदिर को 'माता अष्टलक्ष्मी मंदिर' के नाम से जाना जाता है।


इस मंदिर की विशेषता यहां पर विराजमान माता लक्ष्मी के 8 स्वरूप है। यह मंदिर अष्टलक्ष्मी के नाम से विख्यात है। मान्यता है कि यहां अष्टलक्ष्मी के दर्शन से धन, विद्या, वैभव, शक्ति व सुख की प्राप्ति होती है। यह मंदिर विशाल गुंबद वाला है। मंदिर में देवी लक्ष्मी की 8 प्रतिमाएं भिन्न-भिन्न तल पर स्थापित हैं।


यहां आनेवाले भक्तों को आदि लक्ष्मी, धान्य लक्ष्मी, धैर्य लक्ष्मी, गज लक्ष्मी, विद्या लक्ष्मी, विजया लक्ष्मी, संतना लक्ष्मी व धन लक्ष्मी के दर्शन होते हैं। इस मंदिर के अंत में भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी का प्रतिमा है। यहां आनेवाले श्रद्धालु इस मंदिर के दर्शन किए बिना नहीं वापस नहीं जाते हैं।               


8 कमल पुष्प अर्पित करने की है प्रथा


 हम सभी जानते हैं कि देवी लक्ष्मी को कमल का पुष्प अति प्रिय है। यही कारण है कि यहां आने वाले श्रद्धालु माता को कमल का पुष्प जरूर अर्पित करते हैं। इस मंदिर में 8 कमल पुष्प अर्पित करते हैं क्योंकि इस मंदिर में माता लक्ष्मी 8 स्वरूपों में विराजमान है। यही कारण है कि यहां आने वाले श्रद्धालु भिन्न-भिन्न कमल के पुष्प लेकर आते हैं।    अष्टलक्ष्मी मंदिर एक हिंदू मंदिर है, जो भारत के चेन्नई में इलियट के समुद्र तट (बसंत नगर बीच) के पास स्थित है। मंदिर देवी लक्ष्मी और उनके आठ प्राथमिक रूपों को समर्पित है। गर्भगृहों को एक बहु-स्तरीय परिसर में इस तरह से चित्रित किया गया है कि आगंतुक किसी भी गर्भगृह में कदम रखे बिना सभी मंदिरों में जा सकते हैं।


मंदिर का निर्माण कांची मठ के श्री चंद्रशेखरेंद्र सरस्वती स्वामी की इच्छा पर किया गया था। मंदिर का अभिषेक 5 अप्रैल 1976 को अहोबिला मठ के 44 वें गुरु वेदांत ढेसिका यतीन्द्र महाधेसिकन स्वामी की उपस्थिति में हुआ था।


मंदिर परिसर में ही श्री गणेश, श्री हनुमान का अंजनेय रूप, चिकित्सा के देवता धन्वंतरि, महालक्ष्मी एवं महाविष्णु उपस्थित हैं, साथ ही साथ मंदिर के सामने पवित्र जल श्रोत के रूप में स्वयं विशाल सागर बंगाल की खाड़ी विद्यमान है।


मंदिर के शन्तिमय वातावरण में समुद्र की गूंजती हुई लहरें, तथा मंदिर के दूसरे फ्लोर से समुद्र दर्शन माँ लक्ष्मी के भक्तों को और भी रोमांचित कर देता है। मंदिर मे पूजा, प्रसाद एवं धार्मिक पुस्तकों की प्राप्ति हेतु मंदिर में एक दुकान भी उपलब्ध है।


पौराणिक कथा:


ऐसा माना जाता है कि देवी लक्ष्मी से विवाह करने वाले महाविष्णु ने भी देवी लक्ष्मी के आठ रूपों से विवाह किया था और वे एक साथ मंदिर के अंदर रहते हैं। इसलिए नाम है अष्टलक्ष्मी (लक्ष्मी के आठ रूप) मंदिर। देवी लक्ष्मी के आठ रूप आदिलक्ष्मी, धनलक्ष्मी, धान्यलक्ष्मी, गजलक्ष्मी, संतानलक्ष्मी, वीरलक्ष्मी, विजयलक्ष्मी और विद्यालक्ष्मी। मंदिर की लंबाई 65 फीट और चौड़ाई 45 फीट है।


त्यौहार:

वरलक्ष्मी पूजा, नवरात्रि इस मंदिर का मुख्य त्यौहार है, जो हर साल भव्य तरीके से मनाया जाता है।


23 फ़रवरी 2023

gangeswar mahadev temple

gangeswar mahadev mandir

श्री गंगेश्वर मंदिर  




  गंगेश्वर महादेब गुजरात के दीव शहर से लगभग 3 किलोमीटर दूर  फदुम गांव में स्थित है। ये मंदिर को गुजरात का सबसे प्राचीन शिव मंदिर में से एक माना जाता है ।। मंदिर पूर्ण रूप से भगवान शिव की है।



श्री गंगेश्वर मंदिर: जहाँ हर दू तीन सेकंड में शिव लिंग समुन्द्र-माँ गंगा की जल में डूब जाती है । ये रोचक सत्य का विस्तृत जानकारी :-

श्री गंगेश्वर महादेव मंदिर को भारत के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक माना जाता है जो कि भगवान शिव को समर्पित है। 


भारत में ऐसे कई मंदिर हैं जिनका इतिहास सदियों पुराना है। कोई मंदिर रामायण काल में बना तो कोई मंदिर कृष्णा काल में। सदियों से हिंदुस्तान की धरती ऐसे कई प्राचीन मदिरों की साक्षी रही है। आज भी भारत के कोने-कोने में  एक से एक प्राचीन देवी-देवताओं के अद्भुत मंदिर देखने को मिल जाएंगे। इन्हीं प्राचीन मंदिरों में से एक है श्री गंगेश्वर महादेव और इस मंदिर का 'शिव लिंग'। इस शिव लिंग के दर्शन करने के लिए हर साल लाखों श्रद्धालु आते हैं और इस मंदिर के प्रांगण में पूजा-पाठ करते हैं। समुन्द्र तट के चट्टानों पर स्थापित है ये शिव लिंग। हर दो सेकंड में शिव लिंग से जब समुन्द्र की लहरे टकराती हैं तो इसकी खूबसूरती देखते ही बनती है। 



ऐसा माना जाता है कि ये मंदिर लगभग 5000 साल पुरानी है, और इस मंदिर का निर्माण और शिव लिंग की स्थापना महाभारतकाल में पांडवों द्वारा किए गए थे। इस मंदिर में पांच शिव लिंग है जो हर दो सेकंड में समुद्र की लहरें शिव लिंग से टकराती हैं और फिर ये लहरें वापिस समुद्र में मिल जाती हैं। इस मंदिर के आसपास का वातावातावरण इतना शांत है कि जब भी कोई इस मंदिर के प्रांगण में प्रवेश करता है तो उसे समुद्र की लहरों की आवाज साफ-साफ सुनाई देती है।      


पौराणिक कथाओं के अनुसार जब पांचों पांडव अपने निर्वासन अर्थात् वनवास में थे, तो उसी बीच इस मंदिर का निर्माण किया था।  ये भी कहा जाता है कि पांचों पांडव यहां हर रोज भगवान शिव की पूजा करने आते थे। गंगेश्वर मंदिर में शिव रात्रि का त्योहार बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। सावन के महीने में भी यहां लाखों श्रद्धालु महोदव के दर्शन के लिए आते हैं।   


 इस मदिर में पांच शिव लिंग होने के कारण  यह मंदिर 'पंच शिव लिंग' के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर को 'सीशोर मंदिर' के नाम से भी जाना जाता है। नाम को लेकर ये भी मान्यता है कि गंगेश्वर भगवान शिव का एक नाम है जो गंगा माता को अपनी जटा से घारण करने पर मिला, इसलिए इस मंदिर को गंगेश्वर मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। 


इस मदिर में पांच शिव लिंग हैं इसलिए यह मंदिर 'पंच शिव लिंग' के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर को 'सीशोर मंदिर' के नाम से भी जाना जाता है। नाम को लेकर ये भी मान्यता है कि गंगेश्वर भगवान शिव का एक नाम है जो गंगा माता को अपनी जटा से घारण करने पर मिला इसलिए इस मंदिर को गंगेश्वर मंदिर के नाम से भी जाता हेै।

gangeswar mahadev


Parthasarathy Temple

 

Parthasarathy Temple, Chennai

चलिये आज पार्थसारथी मंदिर ,

 चेन्नई में भगवान  विष्णु के समर्पित 6म शताब्दी क  वैष्णव मंदिर के विषय मे जानते है।।




💐थिरुवल्लिकेनी के पास में स्थित , मंदिर का 6वी से 9वी शताब्दी के अलवर संत का प्रारंभिक मध्यकालीन तमिल साहित्य कैनन, नालयिरा दिव्य प्रबंधम, में महिमामंडित किया गया,ओर ये भगवान विष्णु के समर्पित 108 दिव्यदेश में से एक के रूप में वर्गीकृत किया गया है ।  पार्थसारथी ' नाम क अर्थ होता है- अर्जुन क सारथी ।महाकाव्य महाभारत में अर्जुन का सारथी के रूप में कृष्ण भगवान की भूमिका क वर्णन  करते हुए

 ये मूल रूप से पल्लव   6 वी शताब्दी  में राजा नरसिंहवर्मन प्रथम द्वारा बनाया गया था। मंदिर में विष्णु के पांच रूप का प्रतीक है- योग नरसिम्हा , राम , गजेंद्र वरदराजा , रंगनाथ आ कृष्ण पार्थसारथी के रूप में।



मंदिर चेन्नई का सबसे  पुरान संरचना में से  एक है। 

वेदवल्ली थायर, रंगनाथ, राम, गजेंद्र वरदार, नरसिम्हा, अंडाल , हनुमान , अलवर, रामानुज , स्वामी का मंदिर हैंमनावाला मामुनिगल आ वेदांताचार्य । मंदिर वैखानस आगमन कि सदस्यता लेता है।ओर तेनकलाई परंपरा का पालन करता है । पार्थसारथी ओर योग नरसिम्हा मंदिर के हेतु अलग-अलग प्रवेश द्वार ओर स्तंभ है। गोपुरम (मीनार) ओर मंडप (स्तंभ) विस्तृत नक्काशी से सजाया-सावारा गया है।।

दक्षिण भारतीय मंदिर वास्तुकला की एक मानक विशेषता है।



विशेष जनतब :- 


हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, सप्तऋषियों , सात संतों ने पांच देवताओं पंचवीरों की पूजा की, अर्थात् वेंकट कृष्णस्वामी, रुक्मिणी, सत्यकी, बलराम, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध। महाभारत के अनुसार , विष्णु, कृष्ण के रूप में अपने अवतार में कौरवों के साथ युद्ध के दौरान पांडव राजकुमार अर्जुन के लिए सारथी के रूप में काम कर रहे थे । कृष्ण ने युद्ध के दौरान कोई हथियार नहीं उठाया। अर्जुन और भीष्म के बीच लड़ाई के दौरान भीष्म के बाण से कृष्ण घायल हो गए थे। माना जाता है कि मंदिर में छवि में निशान किंवदंती का पालन करता है। 

इस स्थान को अललिकेनी कहा जाता है, जिसका अर्थ है लिली का तालाब क्योंकि ऐसा माना जाता है कि ऐतिहासिक रूप से यह स्थान लिली के तालाबों से भरा हुआ था। वह स्थान एकमात्र स्थान है जहाँ पीठासीन देवता को मूंछों के साथ स्पोर्ट किया जाता है। एक अन्य कथा के अनुसार, यह स्थान कभी तुलसी वन था। सुमति नाम का एक चोल राजा विष्णु को पार्थसारथी के रूप में देखना चाहता था और उसने तिरुपति के श्रीनिवास मंदिर में प्रार्थना की। श्रीनिवास ने राजा को ऋषि आत्रेय द्वारा निर्मित मंदिर में जाने और सुमति नामक एक अन्य ऋषि के साथ पूजा करने का निर्देश दिया। 



इतिहास


मंदिर मूल रूप से 8वीं शताब्दी में पल्लवों द्वारा बनाया गया था, बाद में चोलों द्वारा और बाद में 15वीं शताब्दी में विजयनगर राजाओं द्वारा इसका विस्तार किया गया।  मंदिर में तमिल में 8वीं शताब्दी के कई शिलालेख हैं  संभवतः दंतिवर्मन के काल के हैं , जो एक विष्णु भक्त थे।  9वीं शताब्दी के कवि-संत थिरुमंगई अलवर भी मंदिर के निर्माण का श्रेय पल्लव राजा को देते हैं।  मंदिर के आंतरिक संदर्भों से, ऐसा प्रतीत होता है कि 1564 सीई के दौरान मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया था जब नए मंदिरों का निर्माण किया गया था। बाद के वर्षों में, गाँवों और बगीचों की बंदोबस्ती ने मंदिर को समृद्ध किया है।  मंदिर में 8वीं शताब्दी के पल्लव राजा, नंदीवर्मन के बारे में शिलालेख भी हैं। 


चोल काल के दौरान मंदिर का बड़े पैमाने पर निर्माण किया गया था और इसी अवधि के बहुत सारे शिलालेख यहां पाए जाते हैं। सबसे बाहरी मंडपम विष्णु के विभिन्न रूपों, विशेष रूप से अवतारों की मूर्तियों से भरा हुआ है । मंदिर में 8वीं शताब्दी के दांतीवर्मा पल्लव, चोल और विजयनगर के शिलालेख भी देख सकते हैं। मंदिर का पहला वास्तुशिल्प विस्तार पल्लवों (तोंडैयार कोन) के शासनकाल के दौरान हुआ था, जैसा कि तिरुमंगई अलवर द्वारा स्पष्ट रूप से वर्णित है । इसका स्मरण पल्लव राजा दंतिवर्मन (796-847 सीई) का शिलालेख है, जो मंदिर में संरक्षित है।


सदाशिव राया, श्रीरंगा राया और वेंकटपति राया II (16वीं शताब्दी) जैसे विजयनगर राजाओं के शासन के 6दौरान मंदिर में एक बड़ा विस्तार देखा गया । तिरुवयमोली मंडप जैसे कई उप-मंदिर और स्तंभित मंडप (मंडप) जोड़े गए।


एक पल्लव राजा ने आठवीं शताब्दी में वर्तमान मंदिर का निर्माण करवाया था। गोपुरम का निर्माण भी एक पल्लव राजा - तोंडाइमन चक्रवर्ती ने करवाया था। ऐसे शिलालेख हैं जो चोल राजाओं राजा राजा और कुलोत्तुंगा III, पांड्य राजा मारवर्मन और विजयनगर वंश के कई शासकों के योगदान को रिकॉर्ड करते हैं जिनमें रामराजा वेंकटपथिराजा और वीरा वेंकटपति शामिल हैं। कुछ समय के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी ने मंदिर का प्रशासन चलाया।


पुष्करणी को कैरावनी कहा जाता है और पांच पवित्र तीर्थों को टैंक के चारों ओर माना जाता है - इंद्र , सोमा, अग्नि , मीना और विष्णु। सात ऋषियों - भृगु , अत्रि , मरीचि , मार्कंडेय , सुमति , सप्तरोमा और जाबाली - ने यहां तपस्या की। मंदिर में सभी पांच देवताओं को तिरुमंगई अलवर द्वारा स्तुति दी गई है। 

अंडाल के लिए एक अलग मंदिर भी है , जो 12 अलवारों में से एक है, जिसे पीठासीन देवता की पत्नी के रूप में भी माना जाता है।


यह पार्थसारथी, अर्जुन के सारथी के रूप में कृष्ण को समर्पित देश के बहुत कम मंदिरों में से एक है और इसमें विष्णु के तीन अवतारों: नरसिम्हा, राम और कृष्ण की मूर्तियाँ हैं। 


असामान्य रूप से, उन्हें एक प्रमुख मूंछों के साथ चित्रित किया गया है और उनके हाथ में एक शंख है। गर्भगृह में पाया जाने वाला प्रतीकात्मक संयोजन भी असामान्य है। यहाँ कृष्ण पत्नी रुक्मिणी, बड़े भाई बलराम, पुत्र प्रद्युम्न, पौत्र अनिरुद्ध और सात्यकी के साथ खड़े दिखाई देते हैं। कृष्ण के साथ मंदिर के जुड़ाव के कारण, तिरुवल्लिकेनी को दक्षिणी वृंदावन माना जाने लगा ।  उन्होंने मंदिर के भीतर तेलिया सिंगार तीर्थ के बारे में भी उल्लेख किया। 


मंदिर का रखरखाव और प्रशासन तमिलनाडु सरकार के हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग द्वारा किया जाता है ।    


22 फ़रवरी 2023

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वृंदावन - पवित्र स्थान

 वृंदावन






 वृंदावन उत्तरी भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश का एक छोटा सा शहर है, जो दिल्ली से लगभग 150 किलोमीटर (93 मील) दक्षिण-पूर्व में स्थित है।  इसे हिंदू धर्म में सबसे पवित्र स्थानों में से एक माना जाता है, क्योंकि इसे भगवान कृष्ण का बचपन का घर माना जाता है।



 वृंदावन भगवान कृष्ण को समर्पित कई मंदिरों का धर्मशाला रूपी घर है, जिनमें प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर, राधा रमण मंदिर , प्रेम मंदिर, निधि वन,सन्तोषी माता मंदिर और इस्कॉन मंदिर शामिल हैं।  यह शहर अपने खूबसूरत बगीचों, घाटों (नदी की ओर जाने वाली सीढ़ियां) और यमुना नदी और कुसुम सरोवर जैसे पवित्र तालाबों के लिए भी जाना जाता है।

















 हर साल, वृंदावन पूरे भारत और दुनिया भर से हजारों भक्तों को आकर्षित करता है, खासकर होली और जन्माष्टमी जैसे प्रमुख हिंदू त्योहारों के दौरान।  शहर की जीवंत संस्कृति, समृद्ध इतिहास और आध्यात्मिक महत्व इसे कई तीर्थयात्रियों और पर्यटकों के लिए एक ज़रूरी जगह बनाते हैं।

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सेंधा नमक के बारे में जानकारी

 सेंधा नमक भारत से कैसे गायब कर दिया गया, शरीर के लिए Best Alkalizer है.... आप सोच रहे होंगे की ये सेंधा नमक बनता कैसे है ?? आइये आज हम आपको...